पोशाक ने सजाई शाम-ए-शायरी की महफ़िल

देश भर के कई नामचीन शायरों ने की शिरकत
मुंबई में कला का पर्याय हमेशा से बॉलीवुड को माना जाता रहा है। इसका असर कला की दूसरी विधाओं पर पड़ा है। या यूँ कह सकते हैं कि पड़ा था। क्योंकि 17 फ़रवरी को मुशायरे की एक ऐसी महफ़िल सजी, जिसने मुंबई के नागरिकों को याद दिलाया कि मुम्बई में बॉलीवुड से बाहर भी कलाएँ हैं और बेहतरीन कलाएँ हैं। यह महफ़िल सजाई थी शहर के सबसे प्रतिष्ठित काव्य संस्थाओं में से एक पोशाक ने और महफ़िल का नाम था शाम-ए-शायरी। विले पार्ले के केशवराव घैसास सभागृह में आयोजित इस मुशायरे में भारत के सबसे बेहतरीन शायरों में से कुछ ने शिरकत की और अपनी रचनाओं से खचाखच भरे हॉल में मौजूद एक एक दर्शक को वाह और आह करने पर मजबूर कर दिया। महफ़िल की शुरुआत पुलवामा में शहीद जवानों की याद में मौन धारण कर की गई। इसके बाद कार्यक्रम का संचालन कर रहे रोहन पानवाला ने एक एक कर के शायरों को अपने कलाम पेश करने के लिए मंच पर आमंत्रित किया। सबसे पहले मंच पर आए पोशाक के संस्थापक आकाश चिंतकिंदी। उनके शेर-‘मुझे सब लोग गाली दे रहे हैं / यक़ीनन अब मैं सीधा चल रहा हूँ’ से महफ़िल पर रंग चढ़ना शुरू हुआ और फिर श्रोताओं की ख़ास फ़रमाइश पर उन्होंने अपनी ग़ज़ल ‘ब्रो’ पढ़ी। उसके बाद अदब के शहर लखनऊ से तशरीफ़ फ़रमा आयशा अयूब ने जब पढ़ा-‘झुकती पलकों की एहतियात समझ / ख़मोशी कर रही है बात, समझ’, तो उपस्थित श्रोता इस शेर की सादगी पर बस मर मिटे। इसके बाद जब उन्होंने पढ़ा-‘उसको रोने से पहले कुछ हमने यूँ तैयारी की / कोने में तन्हाई रक्खी, कमरे में फैलाई रात’ तो श्रोताओं के मुंह से बरबस ‘आह’ निकल गई। इसके बाद मंच पर आए युवाओं के पसंदीदा शायर सुब्हान असद।

उनके शेर-‘रिश्तों की ये नाज़ुक डोरें तोड़ी थोड़ी जाती हैं! / अपनी आँखें दुखती हों तो फोड़ी थोड़ी जाती हैं’ पर वाह वाही रुकने का नाम नहीं ले रही थी। फिर जब उन्होंने ख़ास फ़रमाइश पर तरन्नुम से ‘आज की शब न जा’ सुनाई, तो श्रोता जैसे किसी और ही दुनिया में पहुँच गए। इसके बाद महफ़िल को आगे बढ़ाने की बारी थी देश और दुनिया के सामइनों को अपनी शायरी का दीवाना बना चुके मदन मोहन ‘दानिश’ की। ‘इश्क़ कहता है भटकते रहिए / और तुम कहते हो घर जाना है’ और ‘मोहब्बतों में नए क़र्ज़ चढ़ते रहते हैं /मगर ये किसने कहा है कभी हिसाब करो’ जैसे शेर श्रोतागण ‘दानिश’ साहब के साथ कोरस में पढ़ने लगे। उनके कई दूसरे अशआर को श्रोत्राओं ने इसी अंदाज़ में अपना बनाया। अंत में मंच पर आए शाम के सबसे बड़े आकर्षण शारिक़ कैफ़ी। सिर्फ़ देश ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया के सबसे बेहतरीन शायरों में शामिल शारिक़ साहब ने आग़ाज़ अपनी तीस साल पुरानी एक ग़ज़ल से की। आसान शब्दों में गहरी बात कहने में माहिर शारिक़ साहब शेर कहते रहें और श्रोता एक एक शेर पर तालियों और वाह वाही की बौछार करते रहें। उनके शेर ‘उसकी टीस नहीं जाती है सारी उम्र / पहला धोखा पहला धोखा होता है’ पर श्रोताओं ने अपनी जगह पर खड़े हो कर तालियाँ बजाईं। ‘मौत ने सारी रात हमारी नब्ज़ टटोली / ऐसा मरने का माहौल बनाया हमने’ सहित उनके तमाम अशआर पर श्रोताओं ने भरपूर प्यार लुटाया। आख़िरकार महफ़िल उस ऊंचाई पर जा कर समाप्त हुई कि समाप्ति के एक मिनट बाद तक तालियाँ और शोर थमने का नाम ही नहीं ले रही थीं। अंत में आकाश चिंतकिंदी ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि पोशाक का लक्ष्य है कि वह देश के विभिन्न शहरों में स्तरीय मुशायरों का आयोजन करे। उन्होंने कहा कि पोशाक मुशायरों के अलावा उभरते शायरों को दिशा दिखाने के ज़िम्मेदारी भरे काम को अंजाम दे रहा है और कविता और शायरी के क्षेत्र में आगे भी बेहतरीन से बेहतरीन काम करना जारी रखेगा। इस तरह से मुशायरे का समापन हुआ। इस मुशायरे की सबसे ख़ास बात यह थी इसमें मौजूद श्रोताओं में ज़्यादातर युवा थे। मुशायरे और शुद्ध साहित्यिक आयोजनों को हमेशा से अधेड़ उम्र के लोगों और बुज़ुर्गों की रुचि से जोड़ कर देखा जाता रहा है। मगर पोशाक की शाम-ए-शायरी ने इस मिथक को ग़लत साबित किया और यह दिखा दिया कि मुशायरा या कोई साहित्यिक आयोजन अगर स्तरीय हो तो आज के युवा भी इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले सकते हैं और साहित्य को आगे ले जाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

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